Thursday, October 25, 2018

एनिमल बर्थ कंट्रोल प्रोग्राम सफल बनाईये-लावारिश कुत्तों को बचाईये



डॉ. नीलम बाला
सचिव - भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड
निमल बर्थ कंट्रोल प्रोग्राम अर्थात पशु जन्म दर नियंत्रण या प्रजनन नियंत्रण साधारण भाषा में नसबंदी कहा जा सकता है. इस कार्यक्रम के तहत पशु प्रजनन नियंत्रण का उद्देश्य गली कूचे पर लावारिस कैनाइन एनिमल, जिसमें कुत्तों एवं बिल्लियों की आबादी प्रबंधन के लिए कार्य किया जाता है. इस समय  भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड द्वारा एनिमल बर्थ कंट्रोल( एबीसी) कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है. सरकार एसे कार्यक्रमों पर काफी कोर दे रही है  ताकि कुत्तों की आबादी धीरे धीरे कम हो सके तथा दीर्घकालीन आधार पर उनकी संख्या बढ़ना बंद हो जाए. इस कार्यक्रम के तहत रेबीज प्रतिरोधी टीके भी लगाए जाते हैं ताकि कुत्तों के माध्यम से मनुष्यों में होने वाले रेबीज की समस्या काबू किया जा सके.
इस कार्यक्रम में स्थानीय प्रशासन अर्थात नगर निगम, नगर प्राधिकरण ,जिला प्रशासन ,पंचायत आदि का महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है ताकि वे पशु आबादी प्रबंधन के इस कार्यक्रम में मदद करें . गलत एवं अवैधानिक तौर तरीके से किये  जाने वाले कुत्तों की  आबादी प्रबंधन के अवैज्ञानिक एवं अमानवीय प्रचलन को रोका जा सके . इस संबंध में उल्लेखनीय है कि पारंपरिक तौर से कुत्तों को पकड़ने और उनका विनाश करने की अवधारणा  से समस्या का समाधान नहीं हो सकता है. इतना ही नहीं बल्कि   एनिमल बर्थ कंट्रोल( डॉग्स) रूल्स, 2001 मैं उल्लेख किए गए नियमों का उल्लंघन भी है. इस अधिनियम के तहत स्थानीय निकाय या प्राधिकरण के माध्यम से लावारिस कुत्तों की नसबंदी या बंध्याकरण के कार्यक्रम को सुनियोजित ढंग से चलाने का प्रावधान है जिसके तहत स्थानीय प्रशासन या प्राधिकरण के माध्यम से एक संचालन समिति  का गठन किया जाता है  और कुत्तों के पकड़ने , उनके  परिवहन, ,आश्रय प्रवंधन, बंध्याकरण, टीकाकरण, स्वास्थ्य सम्वन्धी देख-रेख  की बात कही गई है . इस नियम के तहत दिन प्रतिदिन होने वाले  अपराधों को नियंत्रित करने के लिए जागरूकता कार्यक्रम  चलाना, आम आदमी से सहयोग लेना, कुत्तों के मालिकों से विचार- विमर्श कर बेहतर प्रबंधन की रूपरेखा बनाना आदि शामिल है.
जब भी कुत्तों की आबादी प्रबंधन की बात चलती है तो सबसे पहले रेबीज नामक बीमारी की चर्चा सबसे पहले आती है . दरसल, रेबीज एक वायरल बीमारी है जो स्तनपाई प्राणियों के तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती है . बीमारी के अंतिम चरण में इसका वायरस मस्तिष्क में लार के माध्यम से पहुंचता है. जिसका संचरण रोग ग्रषित पशु के संपर्क में आने से होता है. एक बार इसका लक्षण उत्पन्न होने पर यह एक घातक बीमारी का रूप धारण कर लेता है . रेबीज मुख्य रूप से जंगली पशु के मांस भक्षण के माध्यम से सभी गर्म खून वाले पशुओं को होता  है क्योंकि रेबीज एक वायरल बिमारी है . यह तेज तापमान ,डिटर्जेंट या अन्य   संक्रमणकारी पदार्थों के प्रति अति संवेदनशील होता है .इसका संचरण संक्रमित जानवर के लार के माध्यम से ही फैलता है . सामान्यतया संपर्क में आने या हवा के माध्यम से इसका संचरण नहीं होता . बशर्तेत्व चा में घाव या त्वचा का कटा- फटी अवस्था होने से  वायरस रक्त के माध्यम सेमस्तिष्क में फैलता है . इसलिए मस्तिष्क संबंधी बीमारी होने और अंत में मृत्यु का कारण बन जाता है . कभी भी इस समस्या का पहचान होने पर रेबीज वायरस के घातक दशा  से बचाना अत्यंत आवश्यक होता  है.
सामान्यतया एक बार बीमारी का लक्षण उत्पन्न हो जाने पर इसके खतरे की संभावना अत्यंत बढ़ जाती है. ऐसा देखा गया है कि रोग ग्रसित पशु अत्यंत उत्तेजित होता है . उसे घबराहट , बेचैनी या भयभीत  होता है .  पशुओं में  अत्यधिक लार का श्रवण होता है . पशु पानी से दूर भागता है . उसे पीने अथवा भोजन करने  में परेशानी होती है . आंखों की पुतलियां फैल जाती हैं . सामान्य हाव- भाव में काफी अंतर होता है . कई बार पशु में बार लकवा या ऐठन का लक्षण भी दिखाई देता है. कई बार तो कुत्ते सिर्फ बेचैनी का शिकार ही  नहीं होते बल्कि वे  रोते भी  हैं . किसी कोने में पड़े रहते हैं . उनकी टांग निष्क्रिय होने लगती हैं.  ऐसे में जानवरों के साथ में बड़े ही सावधानी तथा सतर्कता पूर्वक व्यवहार की आवश्यकता होती है.
मनुष्य में भी इसी से कुछ मिलते- जुलते लक्षण दिखाई देते हैं . प्रमुख लक्षणों में चिड़चिड़ापन, सिर दर्द ,बुखार या कभी-कभी खुजली जैसे  संक्रमण होने के कारण दर्द होता है . बाद में चल कर के मरीज को लकवा या गले की मांसपेशियों में जकड़न, उन्माद जैसे हालत दिखाई देती है . अंतिम चरण में मृत्यु तक हो सकती है . एक बार अगर रेबीज का लक्षण प्रकट हो जाए तो उसकी चिकित्सा काफी जटिल हो जाती है . आजकल रेबीज नियंत्रण संबंधी जानकारी और चिकित्सा की सुविधाएं आमतौर पर सभी अस्पतालों में उपलब्ध होती है . रेबीज की बीमारी के संबंध में यह ध्यान देने योग्य है कि इसका  संक्रमण आरंभ होने और लक्षण प्रतीत होने की बीच की अवधि 3 से 8 सप्ताह तक हो सकती है . इसलि एकुत्ता काटने के तत्काल बाद रेबीज के चिकित्सा की जानी चाहिए .
रेबीज पर  नियंत्रण पाने के लिए कुत्तों की आबादी प्रबंधन का कार्य स्थानीय प्रशासन के माध्यम से संचालित करना अत्यंत आवश्यक है . अक्सर देखा गया है कि नगर निगमों के द्वारा कुत्तों की आबादी को रोकने के लिए उनको मार दिया जाता है जो एक अवैज्ञानिक एवं गैर कानूनी व्यवस्था  है . कभी भी कुत्तों को बर्बरता पूर्वक मारने और आबादी रोकने का कार्य नहीं किया जा सकता है .ऐसा देखने में आया है कि 1990 के दशक में कुत्तों की आबादी  एक तिहाई से अधिक बड़े ही क्रूरतम तरीके  से कई जगहों पर मार दी गई किंतु वहां पर कुत्तों की संख्या में कोई कमी नहीं आई . ऐसा इसलिए होता है कि मादा कुत्ता का प्रजनन चक्र प्रकृति के अनुसार चलते रहने से अगली साल उनकी  संख्या बढ़ कर फिरसे उतनी ही हो जाती है . इसलिए कुत्तों को पकड़ो- मारो की प्रक्रिया एक अप्राकृतिक, अवैज्ञानिक ,गैरकानूनी  एवं निहायत  अमानवीय कार्य है जिसे रोकने की परम आवश्यकता है . एक अध्ययन के माध्यम से यह जानकारी की गई है कि 6 वर्षों के अंदर एक नर और मादा कुत्ता अगर आजाद छोड़ दिया जाए तो तक़रीबन 66,000 कुत्तों  को जन्म दे सकते हैं.  इस की पुष्टि एक  गणना के माध्यम से हम कर सकते हैं जैसे  प्रथम वर्ष में 12 कुत्ते, द्वितीय वर्ष में 67  कुत्ते,  तृतीय वर्ष में 376 कुत्ते , चतुर्थ  वर्ष में 2107 कुत्ते और पांचवे  वर्ष में 11801 कुत्ते फिर अंतिम वर्ष में 66088 कुत्ते हो जायेंगे.
एक कुत्ते की जिंदगी बड़ी ही पीड़ादाई होती है . शहर-कस्बे में अक्सर कुत्ते भोजन की तलाश में इधर से उधर भटकते हुए वाहनों की या तो ठोकरें खाते हैं या तो उनके नीचे दबकर के मर जाते हैं . उनकी लाश को ठिकाने लगाने में भी अक्सर देर होती है . जोएक दुखद बात ही नहीं है बल्कि इससे स्थानीय स्तर पर गंदगी भी फैलती है . रास्ते में  आने वाले - जाने वाले लोगों के लिए तमाम असुविधाएं होती हैं. नगर निगम को भी किल्लत उठानी पड़ती है . कुत्तों की आबादी प्रबंधन में हर साल अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है . कई बार तो दुर्घटनाओं की अंबार  सी लग जाती है जो रोजमर्रा की जिंदगी को काफी  तकलीफदेह  बना देती है. ऐसी भी स्थिति पैदा हो जाती है कि लोगों में आपसी बाद – विवाद इस स्तर पर चला जाता है कि लोग  कोर्ट- कचहरी चले जाते हैं.
वर्ष 1992 में प्रकाशित  विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्टके मुताबिक कुत्तों को बंदी बना के रखना , पकड़ना और मार देना मालिकों की गैर जिम्मेदाराना हरकत है जिसमें उनकी  मानसिकता और मनुष्य एवं प्रकृति  के बीच में एक टकराव की स्थिति पैदा करता है . इससे स्थानीय प्रशासन बिना शोचे समझे कुत्तों को अंधाधुंध समाप्त करने का चक्र चलता  है ना कि उनके आबादी प्रबंधन की स्थाई व्यवस्था या नीएनिमल बर्थ कंट्रोल कार्यक्रम का संचालन . इससे समय और धन  दोनों का नुकसान होता है तथा समस्या जस की तस बनी रहती है . कुत्ते सिर्फ गली कूचे के ही  एक निवासी ही नहीं है बल्कि उनका मनुष्य के साथ भी गहरा नाता है . हर गली का कुत्ता अपने मोहल्ले के लोगों को ठीक प्रकार से जानता है और मजाल है कि रात्रि को कोई अनजान व्यक्ति मोहल्ले में प्रवेश करें तो वह अपनी चौकीदारी की जिम्मेदारी निभाने में पीछे रहेंगे.
एनिमल बर्थ कंट्रोल प्रोग्राम को संचालित करने के लिए काम करने वाली संस्था या प्रतिष्ठान को भारतीय जीव जंतु  कल्याण बोर्ड के द्वारा बनाए गए नियम- नियमावली का पालन किया जाना. लोगो को   चाहिए इस कार्य में आपसी सहयोग- समर्थन बनाएं रखें . इसलिए लोगो को  मिल- जुल कर काम करने की परम आवश्यकता है . केंद्र सरकार के कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिए राज्य सरकार के पशुपालन विभाग, नगर निगमों, पंचायतों तथा स्थानीय पशु प्रेमियों के साथ - साथ कुत्ता मालिकों के सहयोग की परम आवश्यकता है . इस विषय में आपसी- मेल मिलाप और बात- चीत का कार्य एक सेतु जैसा काम करता है . जिसके माध्यम से आपसी ज्ञान- विज्ञान  और अनुभव का फायदा एक दूसरे को मिलता है.
भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड द्वारा प्रकाशित- “ स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर्स फॉर स्टेरलाइजेशन आफ स्ट्रे डॉग्स अंडर एनिमल बर्थ कंट्रोल प्रोग्राम” नामक पुस्तक का परिपालन जन्म दर नियंत्रण कार्य को अत्यंत आसान एवं बेहतर बना देगा . इस दिशा में काम करने वाले किसी भी कार्यकर्ता को इसका अध्ययन करना चाहिए और तदनुसार व्यवहार में लाना चाहिए . इस पुस्तक में कुत्तों  को  पकड़ने से लेकर ऑपरेशन पहले या ऑपरेशन के बाद तथा उन्हें पकड़े जाने वाले जगह पर पुनः छोड़े जाने की व्यवस्था का व्यापक चर्चा की गयी  है . इस पुस्तक में एनिमल बर्थ कंट्रोल ऑपरेशन की स्टैंडर्ड प्रोसीजर की चर्चा अत्यंत महत्वपूर्ण है जिसके परिपालन से कुत्तों के ऑपरेशन का   घाव तेजी से भरता हैं और उन्हें कम समय में रिलीज किया जा सकता है . इससे जन्म दर नियंत्रण कार्यक्रम के   समय और धन दोनों की बचत होती है . देखा गया है कि कुत्तों की मृत्यु दर और ऑपरेशन से होने वाली परेशानियों से काफी राहत मिलती है.
कुत्तों के आबादी प्रबंधन एवं एनिमल बर्थ कंट्रोल प्रोग्राम में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गली- कूचे या  शहर- मोहल्ले में कूड़ा करकट प्रबंधन की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए . आमतौर से भोजन की तलाश में कुत्ते वहां पहुंचते हैं और आपसी लड़ाई की वजह से रोग ग्रसित कुत्ते दुसरे कुत्ते को काट लेते है और बिमारी का प्रसरण आरम्भ हो जाता है . दूसरे शब्दों में रोगी पशु चुपके से अपनी बीमारी स्वस्थ कुत्तों में फैला देते हैं जिसमें रेबीज प्रसारण की तेजी से  बढ़ जाती है. ऐसी स्थिति में जब रोगी कुत्ते लोगों काट लेते हैं तो रैबीज जानलेवा रूप धारण कर लेता है . इससे लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगती  है . नगर निगम एवं नगर पालिकाओं की समस्या में थोड़ा भी अंतर नहीं आता . इसलिए एनिमल बर्थ कंट्रोल प्रोग्राम का संचालन सभी दृष्टिकोण से सर्वोत्तम है . मुंबई उच्च न्यायालय के एक निर्णय के अनुसार एनिमल बर्थ कंट्रोल प्रोग्राम जब भी चलाया जाए तो उसे कम से कम 5 वर्षों तक निरंतर जारी रखा जाना चाहिए ताकि  कुत्तों की   आबादी प्रबंधन में पूरी सफलता मिले .

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